Wednesday, 22 August 2012

ग़ज़ल 4 7 ( नफरत के बदले प्यार दिया है हमने )

नफरत के बदले प्यार दिया है हमने ,
शायद ये कोई जुर्म किया है हमने !
मरना भी चाहा ,मर सके न हम लेकिन ,
लम्हा लम्हा घुट घुट के जिया है हमने  !
दिल में उठती है टीस सी इक रह रह कर ,
नाम उसका जो भूले से लिया है हमने  !
तू हमसे ज़िंदगी ,क्यों है बता रूठी सी ,
ऐसा भी क्या अपराध किया है हमने  !
हमको कातिल कहने वाले ,ऐ नादां,
तुझ पर आया हर ज़ख्म सिया है हमने !
उसने अमृत या ज़हर दिया है हमको ,
जाने क्या यारो आज पिया है हमने !

No comments: