Wednesday, 22 August 2012

ग़ज़ल 4 5 ( वो पहन कर कफन निकलते हैं )

वो पहन कर कफ़न निकलते हैं ,
शख्स जो सच की राह चलते हैं !
राहे मंज़िल में उनको होश कहाँ ,
खार चुभते हैं , पांव जलते हैं  !
गुज़रे बाज़ार से वो बेचारे ,
जेबें खाली हैं , दिल मचलते हैं  !
जानते हैं वो खुद से बढ़ के उन्हें ,
कह के नादाँ उन्हें जो चलते हैं !
जान रखते हैं वो हथेली पर ,
मौत क़दमों तले कुचलते हैं  !
कीमत उनकी लगाओगे कैसे ,
लाख लालच दो कब फिसलते हैं !
टालते हैं हसीं में  वो उनको ,
ज़ख्म जो उनके दिल में पलते हैं !

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