Wednesday, 22 August 2012

ग़ज़ल 3 8 ( सब से पहले आपकी बारी )

सब से पहले आप की बारी ,
हम न लिखेंगे राग दरबारी !
और ही कुछ है आपका रुतबा ,
अपनी तो है बेकसों से यारी !
लोगों के इल्ज़ाम हैं झूठे ,
आंकड़े कहते हैं सरकारी !
फूल सजे हैं गुलदस्तों में ,
किन्तु उदास चमन की क्यारी !
होते सच , काश आपके दावे ,
देखतीं सच खुद नज़रें हमारी !
उनको मुबारिक ख्वाबे जन्नत ,
भाड़ में जाये जनता सारी  !
सब को है लाज़िम हक़ जीने का ,
सुख सुविधा के सब अधिकारी  !
माना आज न सुनता कोई ,
गूंजेगी कल आवाज़ हमारी  !

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