Wednesday, 22 August 2012

ग़ज़ल 3 7 ( हम तो जियेंगे शान से )

हम तो जियेंगे शान से,
गर्दन झुकाये से नहीं !
कैसे कहें सच झूठ को ,
हम ये गज़ब करते नहीं !
दावे तेरे थोथे हैं सब ,
लोग अब यकीं करते नहीं !
राहों में तेरी बेवफा,
अब हम कदम धरते नहीं !
हम तो चलाते हैं कलम ,
शमशीर से डरते नहीं  !
कहते हैं जो इक बार हम ,
उस बात से फिरते नहीं !
माना मुनासिब है मगर ,
फरियाद हम करते नहीं !

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