Saturday, 25 August 2012

ग़ज़ल 1 4 2 ( कहाँ कुछ और मांगा है , यही इम्दाद कर दो )

कहां कुछ और मांगा है ,यही इम्दाद कर दो,
मिटा दो हर निशां मेरा ,मुझे बर्बाद कर दो !
सुना है आपकी मांगी दुआ सुनता खुदा है,
किसी दिन आप मेरे वास्ते फ़रियाद कर दो !
हुआ मुश्किल बड़ा जीना हमारा अब जहां में ,
हमें अब जिंदगी की कैद से आज़ाद कर दो !
ज़माना बन नहीं जाए कहीं दुश्मन तुम्हारा ,
मिलेगी हर ख़ुशी तुमको हमें नाशाद कर दो !
ये दुनिया लाख दुश्मन हो हमें कुछ ग़म नहीं है ,
हमारा साथ तुम देना उसे नक्काद कर दो !
नहीं देते कसम लेकिन हमें तुमसे है कहना,
मिलेंगे रोज़ हम दोनों यहां मीआद कर दो !
सभी अपने यहां पर हैं ,नहीं हैं गैर तनहा,
कहो अपनी सुनो उनकी अभी इतिहाद कर दो ! 

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