Friday, 24 August 2012

ग़ज़ल 1 3 3 ( हदिसे इसलिये हैं होने लगे )

हदिसे इसलिये हैं होने लगे ,
कश्तियां नाखुदा डुबोने लगे !
ज़ख्म खा कर भी हम रहे चुप मगर ,
ज़ख्म दे कर हैं आप रोने लगे !
कल अभी  आपने  जगाया जिन्हें ,
देख लो आज फिर से सोने लगे !
आप मरने की मांगते हो दुआ ,
खुद पे क्यों  एतबार खोने लगे !
काम अच्छे नहीं कभी भी किये   ,
बस  नहा कर हैं पाप धोने लगे !
लोग खुशियां तलाश करते रहे  ,
दर्द का बोझ और ढोने लगे !
फूल देने की बात करते रहे  ,
खार "तनहा" सभी चुभोने लगे !

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