Friday, 24 August 2012

ग़ज़ल 1 3 2 ( सुनो इक कहानी हमारी जुबानी )

सुनो इक कहानी हमारी जुबानी ,
नई भी नहीं है न है ये पुरानी  !
किसी ने किसी से किया प्यार इक दिन ,
रखी है छुपा कर अभी तक निशानी  !
वहीँ पर सुबह से हुई शाम अक्सर ,
सुहाने थे दिन और रातें सुहानी  !
नहीं भूल सकता कभी वो नज़ारा ,
किसी में थी देखी नदी की रवानी  !
वो क्या दौर था दोस्तो ज़िंदगी का ,
लुटा दी किसी ने किसी पर जवानी !
अजब हाल देखा वहां पर सभी का ,
वहीं प्यास भी थी जहां पर था पानी  !
इसे तुम जुबां पर कभी भी न लाना ,
सुना दी है "तनहा" तुम्हें जो कहानी  !

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