Friday, 24 August 2012

ग़ज़ल 1 2 9 ( नहीं साथ रहता अंधेरो में साया )

नहीं साथ रहता अंधेरों में साया ,
हुआ क्या नहीं साथ तुमने निभाया !
किसी ने निकाला हमें आज दिल से ,
बड़े शौक से कल था दिल में बिठाया !
कभी पोंछते जा के आंसू उसी के ,
था बेबात जिसको तुम्हीं ने रुलाया  !
निभाना वफा तुम नहीं सीख पाये  ,
तुम्हें जिसने चाहा उसी को मिटाया !
चले जा रहे थे खुदी को भुलाये ,
किसी ने हमें आज खुद से मिलाया !
खड़े हैं अकेले अकेले वहीँ पर ,
जहाँ आशियाँ इक कभी था बसाया !
उसे याद रखना हमेशा ही "तनहा" ,
ज़माने ने तुमको सबक जो सिखाया !

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