Sunday, 19 August 2012

खुद-ब-खुद ज़ख्म भी भर जाते हैं ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

खुद-ब-खुद ज़ख्म भी भर जाते हैं ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

खुद-ब-खुद ज़ख्म भी भर जाते हैं ,
फायदा ज़हर भी कर जाते हैं।

सीख जाते हैं भुलाना उनको ,
बन के जो गैर गुज़र जाते हैं।

ख्वाब तो ख्वाब हैं उनका क्या है ,
नींद जो टूटी बिखर जाते हैं।

एक तिनके का सहारा पा कर ,
डूबने वाले भी तर जाते हैं।

इस से पहले कि उन्हें पहचाने ,
वो जो करना था ,वो कर जाते हैं।

फूल यादों पे चढ़ाओ उनकी ,
जीते जी लोग जो मर जाते हैं। 

No comments: