Friday, 10 August 2012

ग़ज़ल 9 0 ( यही सोचकर आज घबरा गये हम ) - लोक सेतिया "तनहा"

यही सोचकर आज घबरा गये हम - लोक सेतिया "तनहा"

यही सोचकर आज घबरा गये हम ,
चले थे कहाँ से कहाँ आ गये हम।

तुम्हें क्या बतायें फ़साना हमारा ,
किसे छोड़ आये किसे पा गये हम।

जिया ज़िंदगी को बड़ी सादगी से ,
दिया जब किसी ने ज़हर खा गये हम।

खुदा जब मिलेगा कहेंगे उसे क्या ,
यही सोचकर आज शरमा गये हम।

रहे भागते ज़िंदगी के ग़मों  से ,
मगर लौट कर रोज़ घर आ गये हम।

मुहब्बत रही दूर हमसे हमेशा ,
न पूछो ये हमसे किसे भा गये हम।

उसी आस्मां ने हमें आज छोड़ा ,
घटा बन जहाँ थे कभी छा गये हम।

रहेगी रुलाती यही बात "तनहा" ,
ख़ुशी का तराना कहाँ गा गये हम।   

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