Wednesday, 22 August 2012

ग़ज़ल 8 4 ( अब सुना कोई कहानी फिर उसी अंदाज़ में ) - लोक सेतिया "तनहा"

अब सुना कोई कहानी फिर उसी अंदाज़ में - लोक सेतिया "तनहा"

अब सुना कोई कहानी फिर उसी अंदाज़ में ,
आज कैसे कह दिया सब कुछ यहां आगाज़ में।

आप कहना चाहते कुछ और थे महफ़िल में ,पर ,
बात शायद और कुछ आई नज़र आवाज़ में।

कह रहे थे आसमां के पार सारे जाएंगे ,
रह गई फिर क्यों कमी दुनिया तेरी परवाज़ में।

दे रहे अपनी कसम रखना छुपा कर बात को ,
क्यों नहीं रखते यकीं कुछ लोग अब हमराज़ में।

लोग कोई धुन नई सुनने को आये थे यहां ,
आपने लेकिन निकाली धुन वही फिर साज़ में।

देखते हम भी रहे हैं सब अदाएं आपकी ,
पर लुटा पाये नहीं अपना सभी कुछ नाज़ में।

तुम बता दो बात "तनहा" आज दिल की खोलकर ,
मत छिपाओ बात ऐसे ज़िंदगी की राज़ में।

No comments: