Monday, 6 August 2012

ग़ज़ल 7 9 ( ग़म से दामन बचाना छोड़ दिया ) - लोक सेतिया "तनहा"

ग़म से दामन बचाना छोड़ दिया - लोक सेतिया "तनहा"

ग़म से दामन बचाना छोड़ दिया ,
हमने आंसू बहाना छोड़ दिया।

अब बहारो खिज़ा से क्या डरना ,
हमने अब हर बहाना छोड़ दिया।

जब निभाना हुआ नामुमकिन तब ,
रूठ जाना ,  मनाना छोड़ दिया।

हो गये हैं जो कब से बेगाने ,
उनको अपना बनाना छोड़ दिया।

कब कहाँ किसने कैसे ज़ख्म दिये ,
हर किसी को बताना छोड़ दिया।

उनको कोई ये जा के बतलाये ,
हमने रोना रुलाना छोड़ दिया।

मिल गया अब हमारे दिल को सुकून ,
जब से दिल को लगाना छोड़ दिया।

ख्याल आया हमारे दिल में यही ,
हमने क्यों मुस्कुराना छोड़ दिया।

हमने फुरकत में "तनहा" शामो-सहर ,
ग़म के नगमें सुनाना छोड़ दिया। 

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