Thursday, 30 August 2012

ग़ज़ल 7 1 ( आई हमको न जीने की कोई अदा ) - लोक सेतिया "तनहा"

आई हमको न जीने की कोई अदा - लोक सेतिया "तनहा"

आई हमको न जीने की कोई अदा ,
हम ने पाई है सच बोलने की सज़ा।

लब पे भूले से किसका ये नाम आ गया ,
जो हुए बज़्म के लोग मुझ से खफ़ा।

हो गया जीना इन्सां का मुश्किल यहां ,
इतने पैदा हुए हैं जहां में खुदा।

हैं कुछ ऐसे भी इस दौर के चारागर ,               ( चारागर = चिकित्सक )
ज़हर भी जो पिलाते हैं कह कर दवा।

हाथ में हाथ लेकर जिएं उम्र भर ,
और होता है क्या ज़िंदगी का मज़ा।

आज "तनहा" हमें मिल गई ज़िंदगी ,
छोड़ मझधार में जब गया नाखुदा।            ( नाखुदा  = माझी )

No comments: