Friday, 10 August 2012

ग़ज़ल 5 0 ( चंद धाराओं के इशारों पर , डूबी हैं कश्तियां किनारों पर )

चंद धाराओं के इशारों पर ,
डूबी हैं कश्तियाँ किनारों पर !
अपनी मंज़िल पे हम पहुँच जाते ,
जो न करते यकीं सहारों पर  !
खा के ठोकर वो गिर गये हैं लोग ,
जिनकी नज़रें रहीं नज़ारों पर !
डोलियाँ राह में लूटीं अक्सर ,
अब भरोसा नहीं कहारों पर  !
वो अंधेरों ही में रहे हर दम,
जिन को उम्मीद थी सितारों पर  !
ये भी अंदाज़ हैं इबादत के ,
फूल रख आये हम मज़ारों पर !
उनकी महफ़िल से जो उठाये गये ,
हंस लो तुम उन वफ़ा के मारों पर !