Friday, 10 August 2012

ग़ज़ल 5 0 ( चंद धाराओं के इशारों पर ) - लोक सेतिया " तनहा "

चंद धाराओं के इशारों पर - लोक सेतिया " तनहा "

चंद धाराओं के इशारों पर ,
डूबी हैं कश्तियाँ किनारों पर।

अपनी मंज़िल पे हम पहुँच जाते ,
जो न करते यकीं सहारों पर।

खा के ठोकर वो गिर गये हैं लोग ,
जिनकी नज़रें रहीं नज़ारों पर।

डोलियाँ राह में लूटीं अक्सर ,
अब भरोसा नहीं कहारों पर।

वो अंधेरों ही में रहे हर दम,
जिन को उम्मीद थी सितारों पर।

ये भी अंदाज़ हैं इबादत के ,
फूल रख आये हम मज़ारों पर।

उनकी महफ़िल से जो उठाये गये ,
हंस लो तुम उन वफ़ा के मारों पर।