Wednesday, 22 August 2012

ग़ज़ल 4 5 ( वो पहन कर कफन निकलते हैं ) - लोक सेतिया "तनहा"

वो पहन कर कफ़न निकलते हैं - लोक सेतिया "तनहा"

वो पहन कर कफ़न निकलते हैं ,
शख्स जो सच की राह चलते हैं।

राहे मंज़िल में उनको होश कहाँ ,
खार चुभते हैं , पांव जलते हैं।

गुज़रे बाज़ार से वो बेचारे ,
जेबें खाली हैं , दिल मचलते हैं।

जानते हैं वो खुद से बढ़ के उन्हें ,
कह के नादाँ उन्हें जो चलते हैं।

जान रखते हैं वो हथेली पर ,
मौत क़दमों तले कुचलते हैं।

कीमत उनकी लगाओगे कैसे ,
लाख लालच दो कब फिसलते हैं।

टालते हैं हसीं में  वो उनको ,
ज़ख्म जो उनके दिल में पलते हैं। 

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