Wednesday, 22 August 2012

ग़ज़ल 3 8 ( सब से पहले आपकी बारी ) - लोक सेतिया "तनहा"

सब से पहले आपकी बारी - लोक सेतिया "तनहा"

सब से पहले आप की बारी ,
हम न लिखेंगे राग दरबारी।

और ही कुछ है आपका रुतबा ,
अपनी तो है बेकसों से यारी।

लोगों के इल्ज़ाम हैं झूठे ,
आंकड़े कहते हैं सरकारी।

फूल सजे हैं गुलदस्तों में ,
किन्तु उदास चमन की क्यारी।

होते सच , काश आपके दावे ,
देखतीं सच खुद नज़रें हमारी।

उनको मुबारिक ख्वाबे जन्नत ,
भाड़ में जाये जनता सारी।

सब को है लाज़िम हक़ जीने का ,
सुख सुविधा के सब अधिकारी।

माना आज न सुनता कोई ,
गूंजेगी कल आवाज़ हमारी।

No comments: