Sunday, 26 August 2012

ग़ज़ल 3 4 ( बहस भ्र्ष्टाचार पर वो कर रहे थे ) - लोक सेतिया "तनहा"

बहस भ्र्ष्टाचार पर वो कर रहे थे -लोक सेतिया "तनहा"

बहस भ्रष्टाचार पर वो कर रहे थे ,
जो दयानतदार थे वो डर रहे थे।

बाढ़ पर काबू पे थी अब वारताएं ,
डूब कर जब लोग उस में मर रहे थे।

पी रहे हैं अब ज़रा थक कर जो दिन भर ,
मय पे पाबंदी की बातें कर रहे थे।

खुद ही बन बैठे वो अपने जांचकर्ता ,
रिश्वतें लेकर जो जेबें भर रहे थे।

वो सभाएं शोक की करते हैं ,जो कल ,
कातिलों से मिल के साज़िश कर रहे थे।

भाईचारे का मिला इनाम उनको ,
बीज नफरत के जो रोपित कर रहे थे। 

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