Sunday, 19 August 2012

पल दो पल में मुर्झाऊंगा ( नज़्म / पुष्प ) डॉ लोक सेतिया = 0 2 भाग एक

पल दो पल में मुर्झाऊंगा ,
शाख से टूट के क्या पाउँगा !
आज सजा हूँ गुलदस्ते में ,
कल गलियों में बिखर जाऊंगा !
उतरूंगा जो तेरे जूड़े से ,
बासी फूल ही कहलाऊंगा !
गूंथा जाऊंगा जब माला में ,
ज़ख्म हज़ारों ही खाऊंगा !
मेरे खिलने का मौसम है ,
लेकिन तोड़ लिया जाऊंगा !
चुन के मुझे ले जायेगा माली ,
डाली को याद बहुत आऊंगा !

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