Tuesday, 21 August 2012

ग़ज़ल 2 8 ( राहे जन्नत से हम तो गुज़रते नहीं ) - लोक सेतिया "तनहा"

राहे जन्नत से हम तो गुज़रते नहीं - लोक सेतिया "तनहा"

राहे जन्नत से हम तो गुज़रते नहीं ,
झूठे ख्वाबों पे विश्वास करते नहीं।

बात करता है किस लोक की ये जहां ,
लोक -परलोक से हम तो डरते नहीं।

हमने देखी न जन्नत न दोज़ख कभी ,
दम कभी झूठी बातों का भरते नहीं।

आईने में तो होता है सच सामने ,
सामना इसका सब लोग करते नहीं।

खेते रहते हैं कश्ती को वो उम्र भर ,
नाम के नाखुदा पार उतरते नहीं।

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