Sunday, 26 August 2012

ग़ज़ल 2 5 ( दर्द दे कर हमें जो सताये कोई ) - लोक सेतिया "तनहा"

दर्द दे कर हमें जो सताये कोई - लोक सेतिया "तनहा"

दर्द दे कर हमें जो सताये कोई ,
हम किधर जाएं फिर ये बताये कोई।

रूठ कर हम तो बैठे हैं इस आस में ,
हम को अपना समझ कर मनाये कोई।

दर खुला हमने रक्खा है इस वास्ते ,
कोई वादा नहीं फिर भी आये कोई।

बेख्याली में कब जाने किस मोड़ पर ,
राह में हाथ हमसे मिलाये कोई।

याद आये किसी की तो भर आये दिल ,
इस तरह भी न हम को रुलाये कोई।

अश्क पलकों पे आ कर छलकने लगें ,
इस कदर आज हमको हंसाये कोई।

शाम ढलते ही इस धुन में रहते हैं हम ,
काश पुरदर्द नग्मा सुनाये कोई।

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