Sunday, 19 August 2012

झूठी सुन्दरता ( कविता ) 2 5 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

 झूठी सुंदरता ( कविता )

खूबसूरत बदन ,
झील सी गहरी आँखें ,
मरमरी से होंट ,
उन्नत उरोज ,
नागिन से काले बाल ,
मदमस्त अदाएं ,
उस पर सोलह श्रृंगार ,
सभी को ,
कर रहे थे दीवाना ,
लग रहा था ,
धरा पर जैसे ,
उतर आई है ,
अप्सरा कोई।
तभी सुनाई दिया ,
उसका कर्कश स्वर ,
नफरत भरे उसके बोल ,
और लगने लगी ,
बेहद बदसूरत वो।
था सब कुछ उसके पास ,
मगर नहीं था ,
कुछ भी उसके पास।

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