Wednesday, 22 August 2012

ग़ज़ल 2 4 ( तड़पा ही गया हिज्र में बरसात का आलम ) - लोक सेतिया "तनहा"

तड़पा ही गया हिज्र में बरसात का आलम - लोक सेतिया "तनहा"

तड़पा ही गया हिज्र में बरसात का आलम ,
और उसपे उमड़ते हुए जज़्बात का आलम।

याद आता है वो वक्ते मुलाकात हमारा ,
बरसात में भीगे हुए हालात का आलम।

बस भीगते ही रहने में थी खैर हमारी ,
बौछार से कम न था शिकायात का आलम।

दीवाना बनाने हमें रिमझिम में चला है ,
दुजदीदा निगाहों के इशारात का आलम।

लफ़्ज़ों में बयाँ कर न सकूँगा मैं सुहाना ,
भीगी हुई जुल्फों की सियह रात का आलम।

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