Saturday, 18 August 2012

अधूरी प्यास ( कविता ) 2 4 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

युगों युगों से ,
नारी को ,
छलता रहा है पुरुष ,
सिक्कों की झंकार से ,
कभी कीमती उपहार से ,
सोने चांदी के गहनों से ,
कभी मधुर वाणी के वार से !
सौंपती रही ,
नारी हर बार ,
तन मन अपना ,
कर विश्वास ,
नारी को प्रसन्न करना ,
नहीं था सदा ,
पुरुष की चाहत ,
अक्सर किया गया ऐसा ,
अपना वर्चस्व ,
स्थापित करने को ,
अपना आधिपत्य ,
कायम रखने के लिये  !
मुझे पाने के लिये  ,
तुमने भी किया वही सब ,
हासिल करने के लिये  ,
देने के लिये  नहीं ,
मैंने सर्वस्व ,
समर्पित कर दिया तुम्हें ,
तुम नहीं कर सके ,
खुद को अर्पित कभी भी मुझे !
जब भी दिया कुछ तुमने ,
करवाया उपकार करने  ,
का भी  एहसास मुझको  ,
और मुझसे  ,
पाते रहे सब कुछ ,
मान कर अपना अधिकार ,
समझा जिसको ,
प्यार का बंधन  ,
और जन्म जन्म का रिश्ता ,
वो बन गया है ,
एक बोझ आज ,
मिट गई मेरी पहचान ,
मेरा अस्तित्व !
अब छटपटा रही हूँ मैं ,
पिंजरे में बंद परिंदे सी ,
एक मृगतृष्णा था शायद ,
तुम्हारा प्यार मेरे लिये  ,
है अधूरी प्यास ,
नारी का जीवन शायद !   

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