Saturday, 18 August 2012

वो जहाँ ( कविता ) 2 3 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

देखी है ,
हमने तो ,
बस एक ही दुनिया ,
हर कोई है ,
स्वार्थी जहाँ ,
नहीं है कोई भी ,
अपना किसी का !
माँ-बाप ,
भाई-बहन ,
दोस्त-रिश्तेदार ,
करते हैं प्रतिदिन ,
रिश्तों का बस व्योपार !
कुछ दे कर ,
कुछ पाना भी है ,
है यही अब ,
रिश्तों का आधार ,
तुम जाने ,
किस जहाँ की ,
करते हो बातें ,
हमें तो लगता है ,
देखा है शायद  ,
तुमने कोई स्वप्न  ,
और खो गये हो तुम !

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