Saturday, 18 August 2012

नेपथ्य ( कविता ) 2 2 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

किसी लेखक ने ,
भूख से तड़पते हुए ,
दरिद्रता भरे ,
जीवन पर लिखी थी ,
जो कहानी ,
तुम कर रहे हो ,
अभिनय ,
उस कहानी के ,
नायक की भूमिका का !
जो दर्द भरे बोल ,
निकले थे ,
एक खाली पेट से ,
बोल रहे हो तुम ,
उन बोलों को ,
भरपेट मनपसंद ,
भोजन खा कर ,
और चाहते हो ,
करना कल्पना ,
उस नायक के ,
दर्द के एहसास की ,
चाहे कर लो ,
कितना भी प्रयत्न ,
ला नहीं पाओगे ,
वो आंसू ,
जो स्वता ही ,
निकल आते हैं ,
हर गरीब के बेबसी में ,
नहीं मिल सकते कहीं से ,
बिकते नहीं हैं ,
दुनिया के बाज़ार में  !
तुम बेच सकते ,
हो बार बार ,
झूठे आंसू दिखावे के ,
है कमाल का ,
अभिनय तुम्हारा ,
महान कलाकार हो तुम ,
आवाज़ तुम्हारी रुलाती है ,
भाती है दर्शकों को ,
मिल जायेंगी तुम्हें ,
तालियाँ दर्शकों की ,
और ढेर सारी दौलत भी ,
मगर ,
कहानी का लेखक ,
कहानी के नायक की तरह ,
जीता रहेगा ,
गरीबी का ,
दुःख भरा जीवन ,
उम्र भर ,
उसकी कहानी से ,
हो नहीं पायेगा  ,
न्याय कभी भी !

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