Friday, 17 August 2012

कोरा कागज़ ( कविता ) 2 1 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

जानता हूँ मैं ,
चाहते हो पढ़ना ,
मेरे मन की ,
तुम पुस्तक ,
जब भी आते हो ,
मेरे पास तुम ,
बैठ कर सामने मेरे ,
तकते रहते हो ,
चेहरा मेरा ,
तिरछी नज़रों से ,
चुपचाप !
जान कर भी ,
बन जाता हूँ ,
अनजान मैं ,
क्योंकि ,
समझता हूँ  मैं ,
जो चाहते हो ,
पढ़ना तुम ,
नहीं लिखा है ,
वो मेरे चेहरे पर !
तुम्हें क्या मालूम ,
क्यों खाली है अभी तक ,
किताब मेरे मन की !
किसी ने मिटा दिया है ,
जो भी लिखा था उस पर !

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