Sunday, 19 August 2012

नज़्म 2 0 भाग एक - अपनी सूरत से ही अनजान हैं लोग - लोक सेतिया "तनहा"

अपनी सूरत से ही अनजान हैं लोग - लोक सेतिया "तनहा"

अपनी सूरत से ही अनजान हैं लोग ,
आईने से यूँ परेशान हैं लोग।

बोलने का जो मैं करता हूँ गुनाह ,
तो सज़ा दे के पशेमान हैं लोग।

जिन से मिलने की तमन्ना थी उन्हें ,
उन को ही देख के हैरान हैं लोग।

अपनी ही जान के वो खुद हैं दुश्मन ,
मैं जिधर देखूं मेरी जान हैं लोग।

आदमीयत  को भुलाये बैठे ,
बदले अपने सभी ईमान हैं लोग।

शान ओ शौकत है वो उनकी झूठी ,
बन गए शहर की जो जान हैं लोग।

मुझको मरने भी नहीं देते हैं ,
किस कदर मुझ पे दयावान है लोग। 

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