Sunday, 19 August 2012

शीशे सा नाज़ुक घर भी है ( नज़्म / ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया = 11 भाग एक

शीशे सा नाज़ुक घर भी है ,
कुछ तूफानों का डर भी है !
जीने की चाहत है लेकिन ,
पीना ग़म का सागर भी है !
इंसानों की खबर न कोई ,
शहर का ऐसा मंज़र भी है !
यूँ तो है खामोश किनारा ,
लहर गई टकरा कर भी है !
ढूंढ के उसको लाओ कहीं से,
खोया सहर में दिनकर भी है  !

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