Sunday, 19 August 2012

शीशे सा नाज़ुक घर भी है ( नज़्म / ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया = 11 भाग एक

शीशे सा नाज़ुक घर भी है - लोक सेतिया "तनहा"

शीशे सा नाज़ुक घर भी है ,
कुछ तूफानों का डर भी है।

जीने की चाहत है लेकिन ,
पीना ग़म का सागर भी है।

इंसानों की खबर न कोई ,
शहर का ऐसा मंज़र भी है।

यूँ तो है खामोश किनारा ,
लहर गई टकरा कर भी है।

ढूंढ के उसको लाओ कहीं से,
खोया सहर में दिनकर भी है।

No comments: