Tuesday, 14 August 2012

दोहे आज के वक़्त के ( राजनीति पर ) 10 भाग तीन - डॉ लोक सेतिया

नतमस्तक हो मांगता मालिक उस से भीख
शासक बन कर दे रहा सेवक देखो सीख !
मचा हुआ है हर तरफ लोकतंत्र का शोर
कोतवाल करबद्ध है डांट रहा अब चोर !
तड़प रहे हैं देश के जिस से सारे लोग
लगा प्रशासन को यहाँ भ्रष्टाचारी रोग !
दुहराते इतिहास की वही पुरानी भूल
खाना चाहें आम और बोते रहे बबूल !
झूठ यहाँ अनमोल है सच का ना  व्योपार
सोना बन बिकता यहाँ पीतल बीच बाज़ार !
नेता आज़माते अब गठबंधन का योग
देखो मंत्री बन गए कैसे कैसे लोग !
चमत्कार का आजकल अदभुत  है आधार
देखी हांडी काठ की चढ़ती बारम्बार !
आगे कितना बढ़ गया अब देखो इन्सान
दो पैसे में बेचता  यह अपना ईमान !

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