Sunday, 26 August 2012

ग़ज़ल 1 9 ( उस को यूं हैरत से मत देखा करो ) - लोक सेतिया "तनहा"

उस को यूं हैरत से मत देखा करो - लोक सेतिया "तनहा"

उस को यूं हैरत से मत देखा करो ,
ज़िंदगी तो हादिसों का नाम है।

जिसको ठुकराने चले तुम बिन पढ़े ,
दोस्ती ही का तो वो पैगाम है।

उठ गया अब तो जहां से एतबार ,
शहर वालों में ये चर्चा आम है।

काफिले में चल रहे हैं साथ साथ ,
अपनी अपनी फिर भी तनहा शाम है।

देख कर लाशें कभी रोते नहीं ,
खोदना ही कब्र उनका काम है।

सत्यवादी कह के हंसता है जहां ,
बस यही सच कहने का ईनाम  है।

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