Thursday, 16 August 2012

कहानी ज़ख्मों की ( कविता ) 1 9 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

बार बार ,
लिखता रहा ,
हर बार ,
मिटाता रहा ,
कहानी ,
अपने जीवन की। 
अच्छा है यही ,
रह जाये अनकही ,
सदा कहानी ,
मेरे जीवन की।
हो न जाये ,
उदास कोई ,
सुनकर मेरी कहानी ,
जीवन में ,
सभी को होती है ,
किसी न किसी से ,
कोई उम्मीद ,
सुनकर मेरी दास्ताँ  ,
टूट न जाये ,
कहीं किसी की कोई आस।
कैसे खड़ा करूँ कटघरे में ,
सभी अपनों को ,
बेगानों को ,
कैसे कह दूं  ,
मिल सका नहीं ,
इक इन्सान ,
इस पूरी दुनिया में मुझे। 
कैसे कर लूँ मैं स्वीकार  ,
कैसे जीते जी ,
मान लूँ  ,
अपनी तलाश की ,
मैं अभी भी हार। 
सुनाऊँ अपनी कहानी ,
मिल जाये  अगर ,
कहीं अपना कोई ,
आंसुओं से  ,
भिगो दूँ उसका दामन ,
रोये  वो भी ,
साथ मेरे देर तक ,
हो जाये मेरे ,
हर दुःख दर्द  ,
और अकेलेपन का अंत। 
मगर लिखी जाती नहीं  ,
उस फूल की कहानी ,
जिसको मसल डाला ,
खुद माली ने।
कहानी उस पत्थर की ,
लगाते रहे जिसको ,
ठोकर सभी लोग।
नहीं लिखी जाती ,
उन सपनों की कहानी ,
बिखरते रहे हर सुबह जो ,
उन रातों की कहानी ,
जिनमें हुई न कभी चांदनी ,
उन सुबहों की ,
क्या लिखूं कहानी ,
मिटा पाया न ,
जिनका सूरज ,
मेरे जीवन से अँधेरा।
काँटों के दर्द भरे शब्दों से ,
मुझे नहीं लिखनी है ,
किसी किताब के ,
खाली पन्नों पर ,
अपने ज़ख्मों की कहानी। 

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