Sunday, 26 August 2012

ग़ज़ल 1 8 ( बस मोहब्बत से उसको शिकायत रही ) - लोक सेतिया "तनहा"

बस मोहब्बत से उसको शिकायत रही - लोक सेतिया "तनहा"

बस मोहब्बत से उसको शिकायत रही ,
इस ज़माने की ऐसी रिवायत रही।

इक हमीं पर न थी उनकी चश्मे करम ,
सब पे महफ़िल में उनकी इनायत रही।

हम तो पीते हैं ये ज़हर ,पीना न तुम ,
उनकी औरों को ऐसी हिदायत रही।

उड़ गई बस धुंआ बनके सिगरेट का ,
राख सी ज़िंदगी की हिकायत रही।

भर के हुक्का जो हाकिम का लाते रहे ,
उनको दो चार कश की रियायत रही।

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