Tuesday, 14 August 2012

सीता का पश्चाताप ( कविता ) 1 8 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

मुझे स्वयं ,
बनना था ,
एक आदर्श ,
नारी जाति के लिये।
प्राप्त कर सकती थी ,
मैं स्वयं ,
अपनी स्वाधीनता ,
अधिकार अपने ,
कर नहीं पाता ,
कभी भी रावण ,
मेरा हरण !
मैं स्वयं कर देती ,
सर्वनाश उस पापी का ,
मानती हूँ आज मैं ,
हो गई थी ,
मुझसे भयानक भूल ,
पहचाननी थी ,
मुझे अपनी शक्ति ,
मुझे नहीं करनी थी चाहत ,
सोने का हिरण पाने की ,
मेरे अन्याय सहने से ,
नारी जगत को मिला ,
एक गलत सन्देश !
काश तुलसीदास ,
लिखे फिर ,
एक नई रामायण ,
और एक आदर्श ,
बना परस्तुत करे ,
मेरे चरित्र को ,
उस युग की भूल का ,
प्राश्चित हो इस कलयुग में !

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