Tuesday, 21 August 2012

ग़ज़ल 1 6 ( ये सबने कहा अपना नहीं कोई ) - लोक सेतिया "तनहा"

ये सबने कहा अपना नहीं कोई - लोक सेतिया "तनहा"

ये सबने कहा अपना नहीं कोई ,
फिर भी कुछ दोस्त बनाये हमने।

फूल उनको समझ कर चले काँटों पर ,
ज़ख्म ऐसे भी कभी खाये हमने।

यूँ तो नग्में थे मुहब्बत के भी ,
ग़म के नग्मात ही गाये हमने।

रोये हैं वो हाल हमारा सुनकर ,
जिनसे दुःख दर्द छिपाये हमने।

ऐसा इक बार नहीं , हुआ सौ बार ,
खुद ही भेजे ख़त पाये हमने।

हम फिर भी रहे जहां में "तनहा" ,
मेले कई बार लगाये हमने।  

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