Monday, 20 August 2012

दो आंसू ( कविता ) 1 5 डॉ लोक सेतिया )

1 5   दो आंसू ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

हर बार मुझे
मिलते हैं दो आंसू
छलकने देता नहीं
उन्हें पलकों से।

क्योंकि
वही हैं मेरी
उम्र भर की
वफाओं का सिला।

मेरे चाहने वालों ने
दिया है
यही ईनाम
बार बार मुझको।

मैं जानता हूं
मेरे जीवन का
मूल्य नहीं है
बढ़कर दो आंसुओं से।

और किसी दिन
मुझे मिल जायेगी
अपनी ज़िंदगी की कीमत।

जब इसी तरह कोई
पलकों पर संभाल कर 
रोक  लेगा अपने आंसुओं को
बहने नहीं देगा पलकों  से
दो आंसू। 

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