Saturday, 18 August 2012

वो जहाँ ( कविता ) 1 4 डॉ लोक सेतिया

1 4        वो जहां ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

देखी है हमने तो
बस एक ही दुनिया
हर कोई है स्वार्थी जहां 
नहीं है कोई भी
अपना किसी का।

माँ-बाप भाई-बहन
दोस्त-रिश्तेदार
करते हैं प्रतिदिन
रिश्तों का बस व्यौपार।

कुछ दे कर कुछ पाना भी है
है यही अब रिश्तों का आधार।

तुम जाने किस जहां की
करते हो बातें
लगता है मुझे जैसे 
देखा है शायद 
तुमने कोई स्वप्न 
और खो गये हो तुम।

No comments: