Wednesday, 1 August 2012

जाने कब मिलोगी तुम ( कविता ) 1 4 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

              जाने कब मिलोगी तुम ( कविता )

दूर बहुत दूर ,
आती है मुझे नज़र ,
हंसती मुस्कुराती हुई ,
छू लूँ उसे प्यार से ,
सोचता हूँ मैं ,
किसी दिन ले ले मुझे ,
अपनी बाहों में वो ,
कब से मैं उसकी तरफ ,
बढ़ाता रहा हूँ कदम ,
मगर लगता है जैसे ,
बढ़ता ही जा रहा है ,
फासला ,
हम दोनों के बीच।
एक तरफा ,
चाहत है शायद ,
उसने चाहा नहीं ,
मुझे कभी भी ,
मैंने उसे देखा है ,
प्यार से मिलते सभी से ,
रूठी हुई है क्यों मुझ से ही ,
लगाया नहीं ,
मुझे कभी गले ,
तड़प रहा हूँ ,
उसके लिए मैं ,
क्यों भाग रही है मुझसे ,
दूर और दूर ज़िंदगी। 

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