Sunday, 12 August 2012

ग़ज़ल 1 3 5 ( हमको जीने की दुआ देने लगे )

हमको जीने की दुआ देने लगे ,
आप ये कैसी सज़ा देने लगे !
दर्द दुनिया को दिखाये थे कभी ,
दर्द बढ़ने की दवा देने लगे !
लोग आये थे बुझाने को मगर ,
आग को फिर हैं हवा देने लगे !
अब नहीं उनसे रहा कोई गिला ,
अब सितम उनके मज़ा देने लगे !
साथ रहते थे मगर देखा नहीं ,
दूर से अब हैं सदा देने लगे !
प्यार का कोई सबक आता नहीं ,
बेवफा को हैं वफ़ा देने लगे !
कल तलक मुझ से सभी अनजान थे ,
अब मुझे मेरा पता देने लगे !
मांगता था मौत "तनहा" रात दिन ,
जब लगा जीने , कज़ा देने लगे !

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