Friday, 24 August 2012

ग़ज़ल 1 3 3 ( हादिसे इसलिए हैं होने लगे ) - लोक सेतिया "तनहा"

हादिसे इसलिए हैं होने लगे - लोक सेतिया "तनहा"

हादिसे इसलिये हैं होने लगे ,
कश्तियां नाखुदा डुबोने लगे।

ज़ख्म खा कर भी हम रहे चुप मगर ,
ज़ख्म दे कर हैं आप रोने लगे।

कल अभी  आपने  जगाया जिन्हें ,
देख लो आज फिर से सोने लगे।

आप मरने की मांगते हो दुआ ,
खुद पे क्यों  एतबार खोने लगे।

काम अच्छे नहीं कभी भी किये   ,
बस  नहा कर हैं पाप धोने लगे।

लोग खुशियां तलाश करते रहे  ,
दर्द का बोझ और ढोने लगे।

फूल देने की बात करते रहे  ,
खार "तनहा" सभी चुभोने लगे।

No comments: