Sunday, 12 August 2012

ग़ज़ल 1 3 1 ( ग़म से इतनी मुहब्बत नहीं करते ) - लोक सेतिया "तनहा"

ग़म से इतनी मुहब्बत नहीं करते - लोक सेतिया "तनहा"

ग़म से इतनी मुहब्बत नहीं करते ,
खुद से ऐसे अदावत नहीं करते।

ज़ुल्म की इन्तिहा हो गई लेकिन ,
लोग फिर भी बगावत नहीं करते।

इस कदर भा गया है कफस हमको ,
अब रिहाई की हसरत नहीं करते।

हम भरोसा करें किस तरह उन पर ,
जो किसी से भी उल्फत नहीं करते।

आप हंस हंस के गैरों से मिलते हैं ,
हम कभी ये शिकायत नहीं करते।

पांव जिनके  ज़मीं  पर हैं मत समझो ,
चाँद छूने की चाहत नहीं करते।

तुम खुदा हो तुम्हारी खुदाई है ,
हम तुम्हारी इबादत नहीं करते।

पास कुछ भी नहीं अब बचा "तनहा" ,
लोग ऐसी वसीयत नहीं करते।

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