Sunday, 26 August 2012

ग़ज़ल 1 2 ( बहती इंसाफ की हर ओर यहां गंगा है ) - लोक सेतिया "तनहा"

बहती इंसाफ की हर ओर यहां गंगा है - लोक सेतिया "तनहा"

बहती इंसाफ की हर ओर यहां गंगा है ,
जो नहाये न कभी इसमें वही चंगा है।

वह अगर लाठियां बरसायें तो कानून है ये ,
हाथ अगर उसका छुएं आप तो वो दंगा है।

महकमा आप कोई जा के  कभी तो देखें ,
जो भी है शख्स उस हम्माम में वो नंगा है।

ये स्याही के हैं धब्बे जो लगे उस पर ,
दामन इंसाफ का या खून से यूँ रंगा है।

आईना उनको दिखाना तो है उनकी तौहीन ,
और सच बोलें तो हो जाता वहां पंगा है।

उसमें आईन नहीं फिर भी सुरक्षित शायद ,
उस इमारत पे हमारा है वो जो झंडा है।

उसको सच बोलने की कोई सज़ा हो तजवीज़ ,
"लोक" राजा को वो कहता है निपट नंगा है। 

No comments: