Friday, 17 August 2012

कोरा कागज़ ( कविता ) 1 2 डॉ लोक सेतिया

  1 2      कोरा कागज़ ( कविता ) डॉ लोक

जानता हूं मैं
चाहते हो पढ़ना
मेरे मन की
पुस्तक को
जब भी आते हो
मेरे पास तुम।

बैठ कर सामने मेरे
तकते रहते हो
चेहरा मेरा
कनखियों से
चुपचाप।

जान कर भी
बन जाता हूं अनजान मैं
क्योंकि समझता हूँ  मैं
जो चाहते हो पढ़ना तुम 
नहीं लिखा है
वो मेरे चेहरे पर।

तुम्हें क्या मालूम
क्यों खाली है अभी तक
किताब मेरे मन की।

मिटा दिया है किसी ने
जो भी लिखा था उस पर। 

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