Friday, 24 August 2012

ग़ज़ल 1 2 9 ( नहीं साथ रहता अंधेरो में साया ) - लोक सेतिया "तनहा"

नहीं साथ रहता अंधेरों में साया - लोक सेतिया "तनहा"

नहीं साथ रहता अंधेरों में साया ,
हुआ क्या नहीं साथ तुमने निभाया।

किसी ने निकाला हमें आज दिल से ,
बड़े शौक से कल था दिल में बिठाया।

कभी पोंछते जा के आंसू उसी के ,
था बेबात जिसको तुम्हीं ने रुलाया।

निभाना वफा तुम नहीं सीख पाये  ,
तुम्हें जिसने चाहा उसी को मिटाया।

चले जा रहे थे खुदी को भुलाये ,
किसी ने हमें आज खुद से मिलाया।

खड़े हैं अकेले अकेले वहीँ पर ,
जहाँ आशियाँ इक कभी था बसाया।

उसे याद रखना हमेशा ही "तनहा" ,
ज़माने ने तुमको सबक जो सिखाया।

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