Wednesday, 8 August 2012

ग़ज़ल 1 1 ( इक आईना उनको भी हम दे आये )

इक आईना उनको भी हम दे आये,
हम लोगों की जो तस्वीर बनाते हैं !  
बदकिस्मत होते हैं हकीकत में वो लोग,
कहते हैं जो हम तकदीर बनाते हैं  !
सबसे बड़े मुफलिस होते हैं लोग वही,
ईमान बेच कर जो जागीर बनाते हैं  !
देख तो लेते हैं लेकिन अंधों की तरह,
इक तिनके को वो शमशीर बनाते हैं  !
कातिल भी हो जाये बरी , वो इस खातिर,
बढ़कर एक से एक नजीर बनाते हैं  !
मुफ्त हुए बदनाम वो कैसो लैला भी,
रांझे फिर हर मोड़ पे हीर बनाते हैं  !

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