Sunday, 12 August 2012

ग़ज़ल 1 1 6 ( हर मोड़ पर लिखा था आगे नहीं है जाना ) - लोक सेतिया "तनहा"

हर मोड़ पर लिखा था आगे नहीं है जाना - लोक सेतिया "तनहा"

हर मोड़ पर लिखा था आगे नहीं है जाना ,
कोई कभी हिदायत ये आज तक न माना।

मझधार से बचाकर अब ले चलो किनारे ,
पतवार छूटती है तुम नाखुदा बचाना।

कब मांगते हैं चांदी कब मांगते हैं सोना ,
रहने को झोंपड़ी हो दो वक़्त का हो खाना।

अब वो ग़ज़ल सुनाओ जो दर्द सब भुला दे ,
खुशियाँ कहाँ मिलेंगी ये राज़ अब बताना।

ये ज़िन्दगी से पूछा हम जा कहाँ रहे हैं ,
किस दिन कहीं बनेगा अपना भी आशियाना।

मुश्किल कभी लगें जब ये ज़िन्दगी की राहें ,
मंज़िल को याद रखना मत राह भूल जाना।

हर कारवां से कोई ये कह रहा है "तनहा" ,
पीछे जो रह गए हैं उनको था साथ लाना।

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