Sunday, 12 August 2012

ग़ज़ल 1 1 5 ( हम पुरानी लकीरें मिटाते रहे )

हम पुरानी लकीरें मिटाते रहे ,
कुछ नये  रास्ते खुद बनाते रहे !
आशियाँ इक बनाया था हमने कहीं ,
उम्र भर फिर उसे हम सजाते रहे !
हर ख़ुशी दूर हमसे रही भागती ,
हादसे साथ अपना निभाते रहे  !
तुम भी मदहोश थे हम भी मदहोश थे ,
दास्ताँ फिर किसे हम सुनाते रहे  !
ख्वाब देखे कई प्यार के रात भर ,
जब खुली आँख सब टूट जाते रहे  !
इक ग़ज़ल आपकी क्या असर कर गई ,
हम उसे रात दिन गुनगुनाते रहे !
जा रहे हैं मगर फिर मिलेंगे कभी ,
दीप आशा के "तनहा" जलाते रहे !     

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