Sunday, 19 August 2012

तमाम उम्र क्यों खड़े थे हम ( नज़्म / ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया = 0 4 भाग एक

तमाम उम्र क्यों खड़े थे हम ,
यही सोच के चल पड़े थे हम !
न पतवार थी न कोई माझी ,
हौसलों से हुए बड़े थे हम  !
वक़्त आया जो फैसले का ,
खुद अपने से भी लड़े थे हम  !
ज़माने की आग से पक गए ,
वरना कच्चे घड़े थे हम  !
झुक गए तेरी मुहब्बत में ,
तबीयत से सरचड़े थे हम  !
मोम की तरह पिघल गए ,
कभी फौलाद से कड़े थे हम  !
फरियाद कातिल से न करेंगे ,
इसी बात पे अड़े थे हम !

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