Sunday, 19 August 2012

पल दो पल में मुर्झाऊंगा ( नज़्म / पुष्प ) डॉ लोक सेतिया = 0 2 भाग एक

पल दो पल में मुर्झाऊंगा - लोक सेतिया "तनहा"

पल दो पल में मुर्झाऊंगा ,
शाख से टूट के क्या पाउँगा।

आज सजा हूँ गुलदस्ते में ,
कल गलियों में बिखर जाऊंगा।

उतरूंगा जो तेरे जूड़े से ,
बासी फूल ही कहलाऊंगा।

गूंथा जाऊंगा जब माला में ,
ज़ख्म हज़ारों ही खाऊंगा।

मेरे खिलने का मौसम है ,
लेकिन तोड़ लिया जाऊंगा।

चुन के मुझे ले जायेगा माली ,
डाली को याद बहुत आऊंगा।

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