Sunday, 8 July 2012

ग़ज़ल 3 ( हमको तो कभी आपने काबिल नहीं समझा )

हमको तो कभी आपने काबिल नहीं समझा ,
दुःख दर्द भरी लहरों में साहिल नहीं समझा !
दुनिया ने दिये  ज़ख्म हज़ार आपने लेकिन ,
घायल नहीं समझा हमें बिसमिल नहीं समझा !
हम उसके मुकाबिल थे मगर जान के उसने ,
महफ़िल में हमें अपने मुकाबिल नहीं समझा  !
खेला तो खिलोनों की तरह उसको सभी ने ,
अफ़सोस किसी ने भी उसे दिल नहीं समझा  !
हमको है शिकायत कि हमें आँख में तुमने ,
काजल सा बसाने के भी काबिल नहीं समझा !
घायल किया पायल ने तो झूमर ने किया क़त्ल ,
वो कौन है जिसने तुझे कातिल नहीं समझा  !
उठवा के रहे "लोक" को तुम दर से जो अपने ,
पागल उसे समझा किये साईल नहीं समझा  !  

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