Sunday, 8 July 2012

ग़ज़ल - 2 ( नया दोस्त कोई बनाने चले हो ) मेरी पसंद - डॉ लोक सेतिया

नया दोस्त कोई बनाने चले हो ,
फिर इक ज़ख्म सीने पे खाने चले हो  !
न टकरा के टूटे कहीं शीशा ए दिल ,
ये पत्थर को क्यों तुम मनाने चले हो !
उसी शाख पर जिसपे बिजली गिरी थी ,
नया आशियाँ क्यों बसाने चले हो !
यकीं कर के मौजों पे अपना सफीना ,
कहाँ बीच मझधार लाने चले हो !
छिपे हैं गुलों में हजारों ही कांटे ,
कि जिनसे घर अपना सजाने चले हो !
सितमगर हैं नश्तर से वो काम लेंगे ,
जिन्हें दागे-दिल तुम दिखाने चले हो  !
ये हंसने हंसाने की तुम चाह लेकर ,
कहाँ आज आँसू बहाने चले हो  !

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